मध्यकालीन भारत अक्सर गलतफहमी का शिकार रहता है: इसे केवल 'अंधकारमयी' युग समझ लेना गलत है। इस समय में नई राज्य व्यवस्थाएँ बनीं, कला-शिल्प चमके और व्यापार-मार्ग बदले। अगर आप इस टैग पर आए हैं तो आपको यहाँ राजनीतिक संघर्ष, स्थापत्य, समाज और अर्थव्यवस्था से जुड़ी साफ और काम की जानकारी मिलेगी।
मध्यकालीन भारत का सामान्य समयकाल 8वीं से 18वीं सदी तक माना जाता है, पर यह रेखा सीमित है। इसमें दिल्ली सल्तनत का उदय, गुलाम वंश, खिलजी, तुगलक, शेरशाह आदि का दौर और बाद में मुग़ल साम्राज्य प्रमुख हैं। दक्षिण में चोल, पल्लव और विजयनगर जैसे शक्तिशाली राज्य रहे। हर क्षेत्र की राजनीतिक संरचना और शासन शैली अलग थी।
यह जानना जरूरी है कि हर शासक की नीतियाँ अलग थीं — कुछ ने कर सुधार किए, कुछ ने सेना और सड़कें मजबूत कीं, और कुछ ने कला-भवन में निवेश किया। उदाहरण के लिए, अकबर ने प्रशासन में सुधार और सहनशीलता नीति अपनाई, जबकि औरंगज़ेब के समय में कुछ अलग फायसले लिए गए।
मध्यकालीन भारत में कला और स्थापत्य नए आयामों पर पहुँचे। मस्जिदें, किले, महलों और मकबरे उस दौर की शान हैं — कुतुब मीनार, हुमायूँ का मकबरा और बाद में ताजमहल इसके उदाहरण हैं। लोककला, संगीत और साहित्य भी फल-phute।
आर्थिक रूप से यह दौर खेती, हस्थशिल्प और अंतर-क्षेत्रीय व्यापार का था। ऊन, सूती कपड़ा, मसाले और धातु-उत्पाद लम्बी दूरी तय करते थे। कर प्रणालियाँ और ज़मींदारी प्रणाली ने ग्रामीण जीवन को प्रभावित किया।
रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में आम लोगों के अनुभव विविध थे — कुछ इलाकों में समृद्धि थी, तो कुछ में युद्ध और कर के कारण कष्ट। शहरों में दस्तकारी और बाज़ार आज की तरह केंद्र बने रहे।
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राजपूत समुदाय, अपनी प्रसिद्ध योद्धा विरासत के साथ, भारत के उत्तरी क्षेत्रों जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश में राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को आकार देता आ रहा है। हाल में राणा सांगा की ऐतिहासिक छवि को लेकर उत्पन्न बहसों ने इस समुदाय के राजनीतिक प्रभाव और सांस्कृतिक गर्व को फिर से केंद्र में ला दिया है।