स्पेस डॉकिंग — क्या है और क्यों जरूरी है?

स्पेस डॉकिंग मतलब दो अंतरिक्ष यानों का कम दूरी पर मिलना और सख्ती से जुड़ना। सुनने में आसान है, पर असल में यह बेहद नाज़ुक और तकनीकी काम है। क्या आप जानते हैं कि अंतिम मिलन की रफ्तार अक्सर सेंटीमीटर प्रति सेकंड होती है? ठीक इसी धीमी और नियंत्रित चाल से ही सफल डॉकिंग होती है।

डॉकिंग सिर्फ कैबिन खोलकर पास होना नहीं है—यह रैण्डेवू, सटीक नेविगेशन, सॉफ्ट कैप्चर और हार्ड कैप्चर जैसे कई चरणों का समूह है। इससे सूटकेस की तरह सामान ट्रांसफर, क्रू का स्वागत या अंतरिक्ष स्टेशन से ईंधन और घटकों का आदान-प्रदान संभव होता है।

मुख्य तरीके: डॉकिंग बनाम बर्थिंग

दो आम तरीके हैं — डॉकिंग और बर्थिंग। डॉकिंग में एक वाहन स्वायत्त या मानव-नियंत्रित तरीके से सीधे डॉक पोर्ट में जुड़ता है (जैसे SpaceX Crew Dragon)। बर्थिंग में रोबोटिक आर्म (जैसे Canadarm2) द्वारा यान को पकड़ा और पोर्ट के साथ जोड़ा जाता है (उदाहरण: Cygnus)। हर तरीका अलग सेंसर, सॉफ़्टवेयर और सुरक्षा प्रक्रिया मांगता है।

यह समझना जरूरी है कि डॉकिंग पोर्ट्स अलग-अलग होते हैं: probe-and-drogue वाले पारंपरिक सिस्टम, और androgynous/IDSS (अंतरराष्ट्रीय डॉकिंग स्टैंडर्ड) जैसे आधुनिक इंटरफेस। IDSS ने कई देशों और कंपनियों के बीच संगतता बढ़ाई है।

तकनीक और सुरक्षा — असल काम क्या होता है?

रैण्डेवू के दौरान वाहन अपनी कक्षा और वेग को मिलाते हैं। GPS से बहुत कुछ तय होता है, पर अंतिम दूरी पर LIDAR, कैमरे और रेडार का काम आता है। नेविगेशन सिस्टम छोटे-मोटे थ्रस्टरों से यान की पोजिशन और ओरिएन्टेशन ठीक करते हैं।

डॉकिंग में दो प्रमुख मु़ड़ते कदम होते हैं: सॉफ्ट कैप्चर (पहला संपर्क और कुशनिंग) और हार्ड कैप्चर (लैच और एयरटाइट आपसी कनेक्शन)। सुरक्षा के लिए कई बैकअप सिस्टम, इंटरलॉक और खुद-ब-खुद कटऑफ मैकेनिज्म लगे रहते हैं। अगर कोई असामान्यता आती है तो यान पीछे हटकर रीडो-प्लान पर चला जाता है।

जो चुनौतियाँ सबसे बड़ी हैं: ऑर्बिटल डेब्री, कम्युनिकेशन लैग और सेंसर की त्रुटि। इसलिए डॉकिंग में प्रत्यक्ष निगरानी के साथ ऑटोनॉमस सिस्टम का मेल चाहिए। SpaceX और अन्य कंपनियां अब स्वचालित डॉकिंग में काफी भरोसा दिखा रही हैं।

आगे क्या होगा? भविष्य में चंद्र मिशनों, गेटवे स्टेशनों और ऑन-ऑर्बिट सर्विसिंग (सैटेलाइट रिपेयर, ईंधन सप्लाई) के लिए बेहतर डॉकिंग टेक्नोलॉजी चाहिए होगी। भारतीय संदर्भ में भी, जैसे Gaganyaan के बाद आगामी मिशनों में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप डॉकिंग विकास की उम्मीद है।

अगर आप स्पेस टेक में रूचि रखते हैं तो डॉकिंग को समझना बेसिक और दिलचस्प दोनों है। यह सिर्फ एक मैकेनिकल जॉइन नहीं—यह अंतरिक्ष में सहयोग और बेहतरीन इंजीनियरिंग का नतीजा है।

ISRO का सफलता पूर्वक स्पेस डॉकिंग मिशन: भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान में नई उपलब्धि

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने स्पेस डॉकिंग मिशन सफलतापूर्वक संपन्न करने के बाद चौथे देश के रूप में अपनी स्थान बना लिया है। इस मिशन में "चेसर" और "टारगेट" नामक दो उपग्रहों की सहायता से December 30, 2024 को लॉन्च किया गया, जिन्होंने January 16, 2025 को डॉकिंग की। यह मिशन भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को साबित करता है जो उपग्रह सेवा, अंतरिक्ष स्टेशन संचालन और अंतरग्रहीय मिशनों के लिए महत्वपूर्ण है।

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